hafizo ke badh gaye hain dekh lo rubaab ab | हाफ़िज़ों के बढ़ गये हैं देख लो रुबाब अब

  - Amaan Pathan

हाफ़िज़ों के बढ़ गये हैं देख लो रुबाब अब
कुछ शराबियों ने भी कमा लिए सवाब अब

आदतन रहा सदा मैं ग़म का ही मुरीद और
कर रहे हो तुम वो मेरी आदतें ख़राब अब

चाँद ला सका नहीं कभी सनम है सच मगर
ला रहा हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आफ़ताब अब

है फ़ज़ा नई नई सी नूर है नया नया
आ रहा है यार मेरा हो के बे-नक़ाब अब

उठ गये थे जब तो फिर से बैठने लगे हो क्यूँ
ख़त्म हो चुकी है बोतलों में सब शराब अब

जाहिलों के साथ तूने उम्र सारी काट दी
एक बार बात मान कर उठा किताब अब

ढूँढता रहा मैं तब कहीं मुझे दिखे नहीं
दे रहे हो मुझको जाने क्यों ये तुम गुलाब अब

क्यूँ बुरा भला कहें किसी को भी अगरचे हम
बन गए हैं हिज्र में जो साहिब-ए-किताब अब

पूछ ही लिया है जब कि ठीक हो अमान तुम
देख लो ज़रा सी देर आलम-ए-ख़राब अब

  - Amaan Pathan

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