हाफ़िज़ों के बढ़ गये हैं देख लो रुबाब अब
कुछ शराबियों ने भी कमा लिए सवाब अब
आदतन रहा सदा मैं ग़म का ही मुरीद और
कर रहे हो तुम वो मेरी आदतें ख़राब अब
चाँद ला सका नहीं कभी सनम है सच मगर
ला रहा हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आफ़ताब अब
है फ़ज़ा नई नई सी नूर है नया नया
आ रहा है यार मेरा हो के बे-नक़ाब अब
उठ गये थे जब तो फिर से बैठने लगे हो क्यूँ
ख़त्म हो चुकी है बोतलों में सब शराब अब
जाहिलों के साथ तूने उम्र सारी काट दी
एक बार बात मान कर उठा किताब अब
ढूँढता रहा मैं तब कहीं मुझे दिखे नहीं
दे रहे हो मुझको जाने क्यों ये तुम गुलाब अब
क्यूँ बुरा भला कहें किसी को भी अगरचे हम
बन गए हैं हिज्र में जो साहिब-ए-किताब अब
पूछ ही लिया है जब कि ठीक हो अमान तुम
देख लो ज़रा सी देर आलम-ए-ख़राब अब
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