इक बहाना हो लौट आने का
क्या पता ये सबब हो जाने का
ये ग़ज़लगोई शय तो ठीक है पर
एक ख़तरा है जान जाने का
तुम हमेशा ही लेट आते हो
क्या ही मतलब तुम्हें बुलाने का
मुझे फिर छोड़ जाओगे तन्हा
फ़ायदा क्या गले लगाने का
इसे रातों में गुनगुनाता था
राज़ गहरा है इस तराने का
काश मुस्तक़बिल और माज़ी के
बीच रस्ता हो आने जाने का
तूने एहसान जो किए मुझ पे
एक मौक़ा तो दे चुकाने का
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