अपने ग़म का न ज़रिया बनाना मुझे
दूर होते ही तुम भूल जाना मुझे
मैंने चाहा था तुझको ख़ुदा की तरह
तू भी पत्थर सा बन के दिखाना मुझे
क्यूँँ मैं आऊँ मुअज़्ज़िन की आवाज़ पर
घर तेरा ही तो तू ही बुलाना मुझे
ज़िंदगी से तो उम्मीद है ही नहीं
मौत के हाथ में है बचाना मुझे
भूल जाऊँ मैं ख़ुद को ही पूरी तरह
यार इतना भी मत याद आना मुझे
कौन कहता है उल्फ़त में नुक़सान है
मिल गया है ग़मों का ख़ज़ाना मुझे
आपने क्यूँँ ये ज़हमत उठाई भला
काम तक़दीर का है रुलाना मुझे
लाख मुश्किल सफ़र हो मगर अब 'अनस'
उसकी यादों से है दूर जाना मुझे
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