एक दरिया किनारे बैठे हैं
आज हम खु़द को हारे बैठे हैं
मेरे शाने पे सिर जो रखते थे
अब वो किस के सहारे बैठे हैं
आज वो मुझ से मिलने आएगी
सो बदन को उतारे बैठे हैं
मुफ़्लिसी हाथ था
में बैठी है
बच्चे भूखे हमारे बैठे हैं
ज़ख़्म भरने को आए हैं सारे
सो तुझे हम पुकारे बैठे हैं
रात के तीन बज गए 'अरहम'
आप किस ग़म के मारे बैठे हैं
— Mohd Arham















