है ज़िन्दगी से इक यही गिला मुझे
सभी मिले, मिला नहीं ख़ुदा मुझे
कई दिनों से ख़ुद से था कटा-कटा
मैं किस से पूछता कि क्या हुआ मुझे
ये मो’जिज़ा है अब तलक हयात हूँ
कई दफ़ा तो इश्क़ भी हुआ मुझे।
जो दूर जा चुका उसे ख़बर करो
निगल रहा है अब ये फ़ासला मुझे
मैं गाँव आके सोचता हूँ ऐ ख़ुदा
लगे न शहर की कभी हवा मुझे
— Armaan khan















