जब भी होता है परेशान चला जाता है
जाने किस सम्त मेरा ध्यान चला जाता है
मुझ को तो हक़ भी नहीं देता वो कुछ कहने का
शिकवा करता हूँ तो इंसान चला जाता है
तुम जताया न करो सब से ये बातें अपनी
तुम जताते हो तो एहसान चला जाता है
मैं वो दीवार हूँ जो गिरती नहीं झोंकों से
मुझ से टकरा के ये तूफ़ान चला जाता है
इक सराए सा बना रक्खा है दिल को तुम ने
हर कोई जान न पहचान चला जाता है
जब भी चाहा के सुना दूँ उसे ग़म अपना तो
बन के वो शख़्स भी अंजान चला जाता है
अब 'अतुल' ग़म न करो उस के चले जाने का
एक मुद्दत पे तो मेहमान चला जाता है
— Atul Kumar















