दिल नहीं है यतीमख़ाना है
लौट आओ जिसे भी आना है
अब किसे अपने पास बैठा लूँ
वो तो जाएगा जिस को जाना है
हार के बैठा हूँ मैं दिल अपना
मुझ से जीता तेरा ज़माना है
राह मैं तेरी अब भी तकता हूँ
तू बता क्या नया बहाना है
मैं किसी ग़ैर का नहीं होता
मुझ पे हक क्यूँ तुझे जताना है
ये तेरा साथ अब नहीं देगा
ग़ौर से देख ये ज़माना है
जब भी तन्हा कहीं मैं बैठा हूँ
दिल ने गाया वही फ़साना है
— Atul Kumar















