क्यूँँ भरोसा नहीं हुआ अब तक
कोई धोखा नहीं हुआ अब तक
तुम ने चाहा था मुझ को जैसा तब
क्या मैं वैसा नहीं हुआ अब तक
इश्क़ तो हो गया तुझे मुझ से
बस तू मेरा नहीं हुआ अब तक
चार काँधों की चाह किस को है
मैं जनाज़ा नहीं हुआ अब तक
ग़म हुआ उस के जाने का लेकिन
कुछ ज़ियादा नहीं हुआ अब तक
चाहती हो कि हाथ फैला दूँ
मैं बिचारा नहीं हुआ अब तक
मैं अकेला हूँ तेरे जाने से
बेसहारा नहीं हुआ अब तक
— Atul Kumar















