कहीं ये तुम्हारी ज़रूरत न निकले

मुहब्बत ही निकले ये आदत न निकले

जुदा हो गए हैं हक़ीक़त में हम तुम
कहीं ये हक़ीक़त हक़ीक़त न निकले

मुझे वो भुला दें भुलाना जो चाहें
मिरे दिल से लेकिन मुहब्बत न निकले

तसव्वुर में खोया रहूँ मैं तुम्हारे
किसी तौर इतनी तो फ़ुर्सत न निकले

मिरी ये दुआ है कहीं भी रहे तू
कभी तेरे दिल से नदामत न निकले

मुहब्बत का तुम को यक़ीं तो दिला दे
मगर उस को तुम से मुहब्बत न निकले

वो हैं साथ लेकिन मुझे तो ये डर है
कहीं साथ उन का इनायत न निकले

वो दुनिया हो या दश्त या एक कमरा
कहीं भी रहूँ मैं ये वहशत न निकले

— Ayush Gupta

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