चाहूँगा गर ज़ियादा जान से भी
हाथ धो बैठूँगा जहान से भी
तुम ने शायद कहीं नहीं देखा
लोग गिरते हैं आसमान से भी
यूँ ही बस देखभाल करते हुए
फूल टूटे हैं बाग़बान से भी
कितने बे-दर्द आदमी हो तुम
काम लोगे लहू-लुहान से भी
तभी तुम को ख़ुशी मिलेगी ना
जब निकल जाऊँगा मकान से भी
कर रहा है तू यार शक मुझ पे
लाल होते हैं होंठ पान से भी
घर परेशाँ था आप भी हो गए
चला जाता हूँ गुलसितान से भी
— Ayush Aavart















