"नाम तुम्हारा"

देखो मैं ने नज़्म लिखी है
इक छोटे सादे काग़ज़ पर
एक हँसी होंठों पर ले कर
तुम इस को चुपके से पढ़ना
लोग अगर कुछ पूछें तुम से
चुप ही रहना कुछ मत कहना
ख़्वाब मेरे कुछ लिक्खे होंगे
कुछ ख़ुशियों की बातें होंगी
अल
साए से दिन कुछ होंगे
कुछ सहमी सी रातें होंगी
एक नदी भी बहती होगी
कुछ परियाँ भी उड़ती होंगी
चाँद वहीं पर बैठा होगा
थक कर घर को लौटा होगा
फूल खिले होंगे काग़ज़ पर
बरसातों का मौसम होगा
तितली होगी पंछी होंगे
इठलाता सा सावन होगा
एक अँधेरे से जंगल में
सावन की बारिश में खिलते
नील कँवल को चुनने जाते
दिख जाएँगे तुम को बच्चे
दूर कहीं इक बस्ती होगी
रात गए देखोगे उस
में
एक दिया जलता सहमा सा
औ उस
में जलती उम्मीदें
उस छोटे काग़ज़ पर मैं ने
सारी दुनिया लिख डाली है
सारी ख़ुशियाँ भी लिक्खी हैं
और ग़मों की हरियाली है
पर्वत भी है झरना भी है
जीवन है औ मरना भी है
और ख़ुदा भी तो लिक्खा है
वाँ तो कोने में रक्खा है
तुम भी हैराँ सोच रही हो
सारी बातें खोज रही हो
मैं तुम को पागल लगता हूँ
सब लिक्खा है सच कहता हूँ
कुछ ही हर्फ़ लिखे थे मैं ने
इन
में सब दुनिया सिमटी है
ग़ौर करो तुम फिर से देखो
नाम तुम्हारा लिक्खा है बस

— Ashutosh Kumar "Baagi"

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