इक डरा गुम-सुम सा बच्चा देखता हूँ

जब कभी तन्हा मैं शीशा देखता हूँ

हाँ हमेशा मुस्कुराता मैं दिखा हूँ
फिर उसे क्यूँ दिल शिकस्ता देखता हूँ

हाँ हमेशा खिलखिलाता मैं दिखा हूँ
फिर उसे क्यूँ तन्हा रोता देखता हूँ

जब मैं ख़ुद का अक्स ज़ाहिर देखता हूँ
ख़ुद से ख़ुद को क्यूँ छुपाता देखता हूँ

क्या जिसे मख़्फ़ी ज़माने से रखा है
जा-ब-जा उस का नमूना देखता हूँ

— Betaab Murtaza

More by Betaab Murtaza

Other ghazal from the same pen

See all from Betaab Murtaza →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling