नाम उसके ये ज़िंदगी की है
अपने दुश्मन से दोस्ती की है
यार फंदा बना ख़यालों का
मैंने ग़ज़लों में ख़ुद-कुशी की है
मेरे दिल की सियाह रातों में
तेरी यादों ने रौशनी की है
बात अपनी न कह सका मैं जब
तब कहीं जाके शायरी की है
'इश्क़ करना न अब किसी से भी
दिल ने ख़्वाहिश ये आख़िरी की है
मुद्दतों बाद मेरे कमरे में
एक ख़ुशबू ने वापसी की है
झूठ पर झूठ बोलता हूँ अब
देख तेरी बराबरी की है
इक वही बात उस सेे कहनी थी
उसने जो बात अन-सुनी की है
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