है हमीं को हमीं से जुदा कर रही
ज़िंदगी अब न जाने है क्या कर रही
आज ज़ख़्म–ए–तमन्ना उभरने लगे
क्या सितम है ये बाद–ए–सबा कर रही
जिस नदी के किनारे मैं बैठा रहा
वो ही मुश्किल मेरा रास्ता कर रही
जाने किस बात पर वो ख़फ़ा हो गई
जाने किस बात का वो गिला कर रही
वस्ल के ज़ख़्म को यार आख़िर तेरे
हिज्र की ये दवा फ़ायदा कर रही
करना तर्क–ए–त'अल्लुक़ है मुझ सेे उसे
और मुझ सेे ही वो मशवरा कर रही
मेरे क़िस्से में है जो तेरी दास्ताँ
मेरे क़िस्से को है फ़ल्सफ़ा कर रही
ख़ुदकुशी के लिए ज़िंदगी ये अभी
जाएज़ा हौसला फ़ैसला कर रही
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