उदासी को कभी भी दौलत-ओ-ज़र में नहीं रखते
अगर जो टूट जाए आइना घर में नहीं रखते
किसी से मिलने जाना तो उदासी छोड़कर जाना
मियाँ मुरझाए फूलों को गुल-ए-तर में नहीं रखते
न कोई दोस्त है अपना न दुश्मन अब रहा कोई
यही बस सोच कर हम धार ख़ंजर में नहीं रखते
मुहब्बत चाहिए तो बंद आँखों से उतर जाओ
ज़ियादा सोचकर पा इस समन्दर में नहीं रखते
बड़े पागल हो जो उस शख़्स को अपना समझते हो
गुलाबों को उठाकर 'दास' कीकर में नहीं रखते
— Das Kanpuri















