वही शख़्स जो दिल को भाए बहुत
वही शख़्स दिल को सताए बहुत
जवानी में दिल फेंक हम भी रहे
हसीनों के नखरे उठाए बहुत
वफ़ाओं की ता'लीम आसाँ नहीं
मियाँ हुस्न के धोखे खाए बहुत
भले लौट कर वो न आए कभी
कबूतर हवा में उड़ाए बहुत
फ़रेबी है दिल उस का उस से कहो
वफ़ाओं की क़स्में न खाए बहुत
भले आज हालात अच्छे हैं 'दास'
बुरे दिन भी उस ने दिखाए बहुत
मुहब्बत भी कैंसर के जैसी है 'दास'
मिटाए हैं माँओं के जाए बहुत
— Das Kanpuri















