क्या ख़्वाब में वो अहद-ए-सलफ़ देख रहा था
मुड़ मुड़ के जो माज़ी की तरफ़ देख रहा था
निकला न किसी में मिरी तक़दीर का मोती
हसरत से मैं हर एक सदफ़ देख रहा था
कम ज़र्फ़ ज़माने से सताया हुआ मजनू
लैला के ही आँचल में कनफ़ देख रहा था
शायद के हो इस सोच में बरसें के न बरसें
बादल मिरे कपड़ों का कलफ़ देख रहा था
सब जंग के आदाब भुलाए हुए ज़ालिम
मासूम के सीने को हदफ़ देख रहा था
हैरत से मैं तन्हाई में बैठा हुआ इक रोज़
चिड़ियों की मुहब्बत में शग़फ़ देख रहा था
ऐ 'फ़ैज़' वो बे-फ़ैज़ नहीं था ये समझ ले
जो तेरा क़लम तेरा शरफ़ देख रहा था
— Dard Faiz Khan















