Dard Faiz Khan

Dard Faiz Khan

@Dard_Faiz_Khan

Dard Faiz Khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dard Faiz Khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

9

Content

52

Likes

86

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

पानी भी है, माहौल भी है, और हवा भी क्या बात कि सर सब्ज़ शजर सूख रहा है — Dard Faiz Khan
एक दूजे के दिल में रहते हुए रो पड़े अलविदा वो कहते हुए — Dard Faiz Khan
एक लम्हे को गुज़रने में लगी हैं सदियाँ जब किसी क़ैस को लैला से जुदा होना पड़ा — Dard Faiz Khan
शे'र होंटों पे रक़्स करते हैं हो अगर कोई हादसा मुझ में — Dard Faiz Khan
ख़ुद-ब-ख़ुद मंज़िल तिरे क़दमों में चल कर आएगी हौसला तेरा अगर शम्स-ओ-क़मर तक जाएगा — Dard Faiz Khan
यार तू मुझ को अब तलाश न कर इश्क़ में फिर से खो गया हूँ मैं — Dard Faiz Khan
नींद आती नहीं है फ़ुर्क़त में मेरी पलकें झुलस गई यारो — Dard Faiz Khan
सलीक़ा तक नहीं इक शे'र कहने का बने फिरते हैं ये शा'इर जहाँ भर में — Dard Faiz Khan
आज तेरा है लगन और मेरी बर्बादी है ये जनम-दिन है मेरा और तेरी शादी है — Dard Faiz Khan
जिन के होते हुए अँधेरा हो लाख लानत हो उन चराग़ों पर — Dard Faiz Khan

Ghazal

इस शोला-ए-अबस को बुझाया न जाएगा दिल जल चुका है हाथ जलाया न जाएगा सूरज हज़ार साज़िशें करता रहे मगर दीवार के ख़िलाफ़ तो साया न जाएगा डाली है उस ने पाँव में ज़ंजीर इश्क़ की अज़्म-ए-सफ़र भी होगा तो जाया न जाएगा ये कह के रुख़ को मोड़ लिया है हवाओं ने बुझता हुआ चराग़ बुझाया न जाएगा सब कह दो हम से शिकवा गिला हो मलाल हो ख़ामोशियों का बोझ उठाया न जाएगा भूले हैं ख़ुद को भूलें मगर किस तरह तुम्हें यादों का नक़्श दिल से मिटाया न जाएगा सय्याद से लिपट के ये कहता है इक परिंद ख़ुद पर तो तुम से तीर चलाया न जाएगा दिल में छिपाए बैठे हैं हम अपना हाल-ए-ज़ार जो कह दिया तो आप से जाया न जाएगा तन्हाइयाँ हैं ग़म है सितम है अज़ाब है ये इश्क़ है जो तुम से निभाया न जाएगा पूछो न हम सेे सहरा-नवर्दी की सख़्तियाँ तुम से ग़ुबार-ए-दिल ये उड़ाया न जाएगा हम ख़ाक हैं सो ख़ाक-नशीनी से 'फ़ैज़' है बिस्तर पे अपना जिस्म सुलाया न जाएगा — Dard Faiz Khan
क्या ख़्वाब में वो अहद-ए-सलफ़ देख रहा था मुड़ मुड़ के जो माज़ी की तरफ़ देख रहा था निकला न किसी में मिरी तक़दीर का मोती हसरत से मैं हर एक सदफ़ देख रहा था कम ज़र्फ़ ज़माने से सताया हुआ मजनू लैला के ही आँचल में कनफ़ देख रहा था शायद के हो इस सोच में बरसें के न बरसें बादल मिरे कपड़ों का कलफ़ देख रहा था सब जंग के आदाब भुलाए हुए ज़ालिम मासूम के सीने को हदफ़ देख रहा था हैरत से मैं तन्हाई में बैठा हुआ इक रोज़ चिड़ियों की मुहब्बत में शग़फ़ देख रहा था ऐ 'फ़ैज़' वो बे-फ़ैज़ नहीं था ये समझ ले जो तेरा क़लम तेरा शरफ़ देख रहा था — Dard Faiz Khan
सुख़न वर सौ जतन कर के लब ओ रुख़सार तक पहुँचे कहाँ हिम्मत किसी में जो तिरे मेआ'र तक पहुँचे ग़ज़ल क्या चाहती है और फ़न के क्या तक़ाज़े हैं जिन्हें ये फ़िक्र लाहक़ थी वही अफ़्कार तक पहुँचे मैं वैसे तो बहुत ख़ुद्दार हूँ लेकिन ये ख़्वाहिश है कि मेरे ग़म का हर क़िस्सा मिरे दिलदार तक पहुँचे सुना है इश्क़ में मंज़िल फ़ना हो कर ही मिलती है सो हम तेरी ही चाहत में सलीब-ओ-दार तक पहुँचे हमें था इश्क़ ख़ालिक़ से उन्हें था इश्क़ आशिक़ से वो अपने यार तक पहुँचे हम अपने यार तक पहुँचे मुहब्बत कैसा रिश्ता है समझ में ये नहीं आता न दिल इनकार तक पहुँचे न दिल इक़रार तक पहुँचे सफ़र में हम सफ़र का साथ पाया तो लगा ऐसा झुलसती धूप में हम साया-ए-दीवार तक पहुँचे ये हलमिन की सदा है और नुसरत का तक़ाज़ा है ज़रूरी है कि अपना हाथ अब तलवार तक पहुँचे उठा है एक तूफ़ाँ आज फिर दरिया ए हस्ती में सफ़ीना कैसे अब इस पार से उस पार तक पहुँचे क़लंदर फ़ैज़ पाते थे हमेशा फ़ाक़ा-मस्ती से जो दुनिया दार थे वो दिरहम-ओ-दिनार तक पहुँचे — Dard Faiz Khan
हम ने ख़ुद अपनी मुहब्बत का गला घोंट दिया दिल से उठती हुई चाहत का गला घोंट दिया जो थी सच्चाई वो ज़ाहिर ही नहीं हो पाई इक फ़साने ने हक़ीक़त का गला घोंट दिया हक़ बयानी के लिए जब वो हुआ महव-ए-कलाम इक सुख़न-वर ने सियासत का गला घोंट दिया बस यहाँ देना था पैग़ाम-ए-मुहब्बत लेकिन किस क़दर सब ने रिवायत का गला घोंट दिया कामयाबी भी क़दम उस के ही चूमेगी यहाँ जिस ने ख़ुद अपनी ज़रूरत का गला घोंट दिया ख़ाना-ए-दिल में सदा जिस को बसाया मैं ने उस ने ही मेरी मसर्रत का गला घोंट दिया दिल का हर दर्द था सरमाया-ए-हस्ती लेकिन 'फ़ैज़' ने अपनी ही उल्फ़त का गला घोंट दिया — Dard Faiz Khan
जल के जब दिल लगी राख हो जाती है आशिक़ों की ख़ुशी राख हो जाती है हिज्र के शे'र जिस पर मैं लिख देता हूँ मेरी वो डाइरी राख हो जाती है पत्थरों के मकानात जलते नहीं हाँ मगर झोपड़ी राख हो जाती है इश्क़ में दर्द है दर्द में है मज़ा बे मज़ा ज़िंदगी राख हो जाती है कोई भी चीज़ टिकती नहीं उस के पास हर पुरानी नई राख हो जाती है जिस में इक दूसरे पर भरोसा न हो ऐसी हर दोस्ती राख हो जाती है चार दिन जेब में गर न पैसे रहें इश्क़ क्या आशिक़ी राख हो जाती है गुल से बुलबुल अगर बात करने लगे देख कर हर कली राख हो जाती है अब तो जुगनू भी दावा ये करने लगे हम से भी तीरगी राख हो जाती है सिर्फ़ सिगरेट से दिल ही जलते नहीं इन लबों की नमी राख हो जाती है जिस में मिल के भी दो लोग मिलते नहीं ऐसी वाबस्तगी राख हो जाती है इक सहेली को उस की अगर फूल दूँ देख कर दूसरी राख हो जाती है शे'रियत जिस में आती नहीं है नज़र फ़ैज़ वो शा'इरी राख हो जाती है — Dard Faiz Khan
ज़माना था वही अच्छा हमारा भी तुम्हारा भी कि जिस में एक था रस्ता हमारा भी तुम्हारा भी कसाफ़त हिज्र की चेहरों से ज़ाहिर क्यूँ न हो जाए कि जब है हाल इक जैसा हमारा भी तुम्हारा भी बुज़ुर्गों ने कहा था जो वही दरपेश आ पहुँचा मुहब्बत की तो दिल टूटा हमारा भी तुम्हारा भी यही कहते हुए हम तुम जुदा हो जाएँगे इक दिन कभी तो फिर मिलन होगा हमारा भी तुम्हारा भी तुम्हारे इश्क़ में हम भी परिंदा बन के रह लेंगे अगर हो एक ही पिंजरा हमारा भी तुम्हारा भी ज़माने के झमेलों में अगर हम तुम उलझ जाते बहुत नुक़सान हो जाता हमारा भी तुम्हारा भी वफ़ा की सेज पर इक साथ फिर सोएँगे हम दोनों अगर पूरा हुआ सपना हमारा भी तुम्हारा भी बुलंद अपना करो में'यार तो ऐ यार मुमकिन है रहेगा बज़्म में जलवा हमारा भी तुम्हारा भी जुदा वो 'फ़ैज़' हम से हो गए ख़ुद जो ये कहते थे बहुत मज़बूत है रिश्ता हमारा भी तुम्हारा भी — Dard Faiz Khan
हम भी ले सकते थे बदला ज़ुल्म का तलवार से जंग पर जीती थी हम ने अम्न की गुफ़्तार से देखने आया था रौनक़ आज मैं बाज़ार की ग़म का ही कम दाम था सो ले लिया बाज़ार से रुख़ से पर्दा वो हटा दे तो बनेगी कोई बात अब इन आँखों को गरज़ है उस के ही दीदार से थक गया पढ़ पढ़ के मैं ख़बरें सितम की जब्र की हो गई नफ़रत सी मुझ को आज कल अख़बार से सब के अब हैं शादमाँ मारे हसद के देख तो और ये मौक़ा मिला उन को तिरे इनकार से ख़ाली दामन ले के हम सर को झुकाए हैं खड़े आज ख़ाली पर न जाएँगे तिरे दरबार से तीरगी ऐसे जहालत की न हो पाएगी कम फ़िक्र के सूरज उगाओ ज़ेहन की दीवार से शर्म से उस की भी आँखें उठ नहीं पाईं थी फिर फ़ैज़ रुसवा हो के जब निकला था कू-ए-यार से — Dard Faiz Khan
पता कीजे कि ऐसा क्या हुआ है ज़माने से वो क्यूँ रूठा हुआ है अचानक जो मिला था राह चलते वो मेरे ज़ेहन पर छाया हुआ है अदालत फ़ैसला करती है सच्चा हमारा सच मगर झूठा हुआ है तुम्हें चट्टान सा दिखता है लेकिन वो शीशे की तरह टूटा हुआ है हुआ तो कर्बला में ज़ेर-ए-ख़ंजर मगर सजदा वही सजदा हुआ है सितारों का बिखरना देखते हो मगर ये कुल जहाँ बिखरा हुआ है उजाला हो गया आँखों से ओझल अँधेरा दूर तक ऐसा हुआ है जो अपने आप को समझा था सब कुछ सर ए बाज़ार वो रुसवा हुआ है सनम को ख़्वाब में देखा जो मैं ने सो मुद्दत बा'द अब सोना हुआ है ज़रा सा मुस्कुरा कर देखना था मगर ये फ़ैज़ क्या समझा हुआ है — Dard Faiz Khan
ज़मीं पर रहने वाले आसमाँ की बात करते हैं हैं ज़र्रे ख़ाक के पर कहकशाँ की बात करते हैं हों तलवारों तले गर्दन कि नेज़ों पर हों उन के सर जो अहल-ए-'इश्क़ हैं अम्न-ओ-अमाँ की बात करते हैं जहाँ ईमान की ख़ुशबू उड़ा करती है हर लम्हा फ़रिश्ते उन के संग-ए-आस्ताँ की बात करते हैं हमें क्यूँ अब तमन्ना हो कि जन्नत पाएँगे इक दिन जहाँ पर ज़िक्र-ए-जन्नत हो, तो माँ की बात करते हैं ये किस की बात पर इतना यक़ीं करने लगे हैं जो ये ख़ाकी जिस्म भी अब दो-जहाँ की बात करते हैं यक़ीं हो तो ख़ुदा-ए-पाक की रहमत पे ऐसा हो झुलसती धूप में हम साइबाँ की बात करते हैं जहाँ को क़लमा-ए-तौहीद से महका दिया जिस ने उसी इक मेहरबाँ की, बाग़बाँ की बात करते हैं हक़ीक़त से तअल्लुक़ है हमारा हम हक़ीक़त हैं ख़यालों के पुजारी बस गुमाँ की बात करते हैं ये दिल वालों की बस्ती है यहाँ हैं दर्द के क़िस्से सो अहल-ए-दिल फ़क़त सोज़-ए-निहाँ की बात करते हैं ख़ुदा का शुक्र है हम पर मुसलसल 'फ़ैज़' जारी है ये आँखें नम ही रहती हैं फ़ुग़ाँ की बात करते हैं — Dard Faiz Khan
न जाने क्यूँ मुझे अब ख़ुद पे इख़्तियार नहीं फ़िराक़-ए-यार में दिल को कहीं क़रार नहीं कोई भी हाल पे मेरे न ग़म-ज़दा होगा मुझे पता है मिरा कोई सोगवार नहीं ये मेरी आँख के अश्कों की ख़ुश्क साली है ये दिल है गिर्या-कुनाँ चश्म अश्क-बार नहीं रुसूख़ देख के धोखे में तुम न आ जाना बड़े हैं लोग मगर साहिब-ए-वक़ार नहीं तिरी जो याद है मदफ़ून मेरे सीने में मिरा वजूद तिरे इश्क़ का मज़ार नहीं गुलों में रंग ही तुझ से है इस लिए शायद बहार जिस को समझते हैं वो बहार नहीं पड़ा हुआ था लहद में मगर सुकून कहाँ कि 'फ़ैज़' मुर्दा बदन महवे इंतिज़ार नहीं — Dard Faiz Khan
उसे मुझ सेे बिछड़ना चाहिए था मिरे अश्कों को रस्ता चाहिए था ग़मों का दिल जलाना चाहिए था तुम्हें यूँँ मुस्कुराना चाहिए था जुदा हम इस लिए भी हो गए थे उसे कोई दिवाना चाहिए था किसी के घर की ज़ीनत हो गई है मुझे जिस का सहारा चाहिए था तुझे तो मिल गया अपना ठिकाना मुझे तेरा ठिकाना चाहिए था नई दुनिया में तू ने रंग बदला मुझे तो, तू पुराना चाहिए था हमारे हाल पर जो हँस रहे हैं उन्हें भी इश्क़ होना चाहिए था सुना है ख़ुश नहीं रहते हो तुम भी तुम्हें तो मुझ में होना चाहिए था मिला है 'फ़ैज़' जो आधा अधूरा हमें पूरा का पूरा चाहिए था अगर वो पढ़ रहे थे 'फ़ैज़' तुम को तो फिर चीख़ों से रोना चाहिए था — Dard Faiz Khan
तिरे जलवों के चर्चे हो रहे हैं माह पारों में मचलते हैं तिरे होंटों के नग़्में आबशारों में ज़मीन ओ आसमाँ रंगे गए हैं रंग से तेरे तिरा ही हुस्न आया है निखर कर लाला ज़ारों में तिरे नज़दीक आ जाने से इस दिल का ये आलम है कि जैसे नाचते हैं मोर ख़ुश हो कर बहारों में फ़लक पर कहकशाँ की माँग भरने कौन आया है अजब इक खलबली सी मच गई है क्यूँ सितारों में तुम्हारा शुक्रिया तुम आ गए हो बर सर-ए-महफ़िल हुई है यक ब यक हलचल सी साज़-ए-दिल के तारों में इनायत है ख़ुदा की, ये तुम्हारा हुस्न-ए-ला-सानी अलग सब सेे नज़र आते हो तुम मुझ को हज़ारों में नज़र में फ़ैज़ आ जाता है मंज़र क़ैस लैला का मुसाफ़िर जब सफ़र करता है कोई रेगज़ारों में — Dard Faiz Khan
ऐसे आया है बे-नक़ाब कोई जैसे निकला हो माहताब कोई मेरी बाहों में इस तरह आया शाख़ पर जिस तरह गुलाब कोई दिल कहीं पर सुकूँ नहीं पाता दिल पे उतरा है क्या अज़ाब कोई मैं हूँ नादिम सवाल पर अपने काश आए तिरा जवाब कोई मेरे हिस्से में कुछ नहीं आता करने लगता है जब हिसाब कोई सब सेे मिलते हैं ख़ुश मिज़ाजी से चाहे अच्छा हो या ख़राब कोई बे-हयाई का दौर है साहब फिर जलाया गया हिजाब कोई ज़िंदगानी के ख़्वाब टूट गए मैं ने देखा है जब हुबाब कोई ज़ुल्म हद से गुज़र गया तेरा तुझ पे आएगा अब इताब कोई इस तरह दिल हमारा टूटा है जिस तरह शाख़ से गुलाब कोई फ़ैज़ के घर वो जब भी आता है छोड़ जाता है बस किताब कोई — Dard Faiz Khan
आप की याद से कुछ ऐसे जुदा होना पड़ा ख़ाक में मिल के मुझे ख़ुद ही फ़ना होना पड़ा सोज़न ओ ख़ार चुभन नकहत-ए-गुल बाद-ए-सबा देख ले मुझ को तिरे इश्क़ में क्या होना पड़ा एक लम्हे को गुज़रने में भी इक अर्सा लगा जब किसी क़ैस को लैला से जुदा होना पड़ा जब ख़िज़ाओं में बहारों की तलब हम से हुई दर्द-ए-दिल को वहाँ कुछ और सिवा होना पड़ा मुनकिरों पर जो कभी टूट पड़ा कोई अज़ाब फिर उन्हें भी तो परस्तार-ए-ख़ुदा होना पड़ा ज़ख़्म दिल का भी रहे उस का मुदावा भी हुए मुझ मरीज़-ए-जाँ को ख़ुद अपनी दवा होना पड़ा खिदमत-ए-दीं के लिए चुन लिया अल्लाह ने जब कर्बला वालों को यसरिब से जुदा होना पड़ा फ़ैज़ जब संग तराशी पे हुआ आमादा एक पत्थर को भी फिर बेश-बहा होना पड़ा — Dard Faiz Khan