सोचता हूँ तो हर कहीं मुश्किल

वरना दुनिया में कुछ नहीं मुश्किल

आह का है गुज़र ज़मीं ता फ़लक
मैं तो समझा था है यहीं मुश्किल

मुझ से पूछो मिज़ाज मुश्किल का
मुझ को लगती है नाज़नीं मुश्किल

ढूँढ़ते हम रहे जहाँ भर में
और थी जे़र‌ ए आसतीं मुश्किल

प्यास ऐसी की लब भी तर न हुए
चूमना हो गई जबीं मुश्किल

कश लगाते ही जाँ सुलगती है
तू है सिगरेट से भी हसीं, मुश्किल

फ़ैज़ आमाल के बदौलत है
आसमाँ सख़्त और ज़मीं मुश्किल

— Dard Faiz Khan

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