ग़म की राहों में दिल को जलाना पड़ा
ख़ुद को हर रात फिर आज़माना पड़ा
जिस को चाहा था दिल से कभी उम्र भर
उस को क्यूँ आज दिल से भुलाना पड़ा
आइनों में भी चेहरा न पहचाना था
ख़ुद से ही फिर मुझे रूठ जाना पड़ा
हर ख़ुशी दर्द बनकर उभरने लगी
मुस्कुराने पे भी दिल जलाना पड़ा
अब न शिकवा न कोई तमन्ना रही
ज़िन्दगी को यूँ ही बस बिताना पड़ा
— DEEPAK CHATURVEDI















