ishaara na karke sukoon mil raha hai | इशारा न करके सुकूँ मिल रहा है

  - "Dharam" Barot

इशारा न करके सुकूँ मिल रहा है
भरोसा न करके सुकूँ मिल रहा है

ग़लत कौन उस
में न उलझा कभी भी
ख़ुलासा न करके सुकूँ मिल रहा है

न मानी तो हमने निभाई थी यारी
तमाशा न करके सुकूँ मिल रहा है

चरागों से है दोस्ती अपनी जब तब
सवेरा न करके सुकूँ मिल रहा है

तिमिर दे गया है ये खुशियाँ हमें जब
दिखावा न करके सुकूँ मिल रहा है

दिया हौसला जो ज़रा फिर उड़ी थी
बिचारा न करके सुकूँ मिल रहा है

दिखा आईना फिर चुना रास्ता था
दुलारा न करके सुकूँ मिल रहा है

बुरी सबको अपना बनाने की आदत
धरम का न करके सुकूँ मिल रहा है

  - "Dharam" Barot

Faith Shayari

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