वो दिखावा सामने अनजान के कर ही रहा है
इन दिखावों में ही मध्यम वर्ग तो मर ही रहा है
शहर में गावों से सारे लोग ऐसे आ रहे है
गाँव में तो सिर्फ़ अब जर्जर सा ये घर ही रहा है
बाप का था दर्द समझा ही नहीं अय्याश बेटा
बाप को तो मार कर अब ब्याज वो भर ही रहा है
ज़ख़्म का है दर्द जो महसूस करना है तुझे ही
औरों को लगता यही है घाव तो भर ही रहा है
अपनी वो आवाज़ गैरो पर उठाता ज़ोर से है
ग़लती हो अपनो से फिर तो पुतला बनकर ही रहा है
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