थी कुछ से प्रीति था कुछ से हमारा बैरकभी अपना कभी अपना बना था ग़ैरकठिन हर रास्ता मंज़िल दिखाएगामिलेगी क़ामयाबी तुम चलाओ पैर— "Dharam" Barot