यूँँ तो हर एक से ही राब्ते रक्खे
मगर मुझ सेे मिला तो फ़ासले रक्खे
मुहब्बत जितनी भी थी बस तुझी से थी
किसी से फिर न कोई सिलसिले रक्खे
तिरे रहम-ओ-करम से ही मिले सब ज़ख़्म
मिरे सब ज़ख़्म तू ने ही हरे रक्खे
ग़ज़ल के क़ाफ़िए बदले, ग़ज़ल बदली
ग़ज़ल के फिर म'आनी भी नए रक्खे
न थी उम्मीद उसके लौट आने की
मगर दरवाजे सारे ही खुले रक्खे
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