यूँँ तो हर एक से ही राब्ते रक्खे
मगर मुझ से मिला तो फ़ासले रक्खे
मुहब्बत जितनी भी थी बस तुझी से थी
किसी से फिर न कोई सिलसिले रक्खे
तिरे रहम-ओ-करम से ही मिले सब ज़ख़्म
मिरे सब ज़ख़्म तू ने ही हरे रक्खे
ग़ज़ल के क़ाफ़िए बदले, ग़ज़ल बदली
ग़ज़ल के फिर मआ'नी भी नए रक्खे
न थी उम्मीद उस के लौट आने की
मगर दरवाज़े सारे ही खुले रक्खे
— Dileep Kumar















