ऐसे तो क्या नहीं मिला पुर्सिश किए बग़ैर
अपना हुनर न जाएगा आतिश किए बग़ैर
जो हाल था गुज़िश्ता बरस अब भी है वही
बैठा है वक़्त क्यूँ कोई गर्दिश किए बग़ैर
इस बार भी क़रीब से गुज़रा वो शहर के
इस बार भी घटा गई बारिश किए बग़ैर
देखो सुनोना रात का मंज़र हसीन है
कैसे हम इस को जाने दें ख़्वाहिश किए बग़ैर
सब दुश्मनों का शुक्र कि मैं क़ामयाब हूँ
ऐ दोस्त तू कहाँ चला सोज़िश किए बग़ैर
ता उम्र तू न जाएगा ऐ 'दर्द' ज़ीस्त से
हम ने भी मानना नहीं कोशिश किए बग़ैर
— Divyansh "Dard" Akbarabadi















