झूठ बोल देते हैं जा चुकी है बीनाई
और देखते हैं फिर क्या बची है अच्छाई
क्या हुआ जो महफ़िल में बन गया लतीफ़ा मैं
ये सुकून क्या कम है उस को चुनरी पहनाई
जिस के साथ होता है वो ही जानता है बस
बात थी बहुत आसाँ मुश्किलों से समझाई
घर में दो बड़ी लाशें रस्सियों से लटकी हैं
पूछता है छोटा भी क्या करेंगे अब भाई
हम गरीब लोगों पर इश्क़ यूँ न ज़ाया' कर
तू तो शाहज़ादी है हम कहाँ के सौदाई
— Divyansh "Dard" Akbarabadi















