ख़ुद से दूरी नहीं समझते हम
जी हुज़ूरी नहीं समझते हम
कौन सी बात उस ने करनी थी
जो कि पूरी नहीं समझते हम
तेरे होंठों पे इक हँसी के सिवा
कुछ ज़रूरी नहीं समझते हम
तीसरी सफ़ की ख़ामुशी को कभी
ला-शुऊरी नहीं समझते हम
एक तस्वीर जो कि आधी है
बस अधूरी नहीं समझते हम
— Divyansh "Dard" Akbarabadi















