आँधी चलती है रात-भर मुझ में

टूट कर गिर गए शजर मुझ में

ज़ख़्म ले के मैं अब कहाँ जाऊँ
शे'र कहता है चारा-गर मुझ में

कौन था जिस से ये मुहब्बत थी
कौन फिर कर गया असर मुझ में

रहगुज़र किस तरफ़ मुझे लाया
रो पड़ा मेरा हम-सफ़र मुझ में

आतिश-ए-दिल है दरमियाँ ऐसी
जल रहा हो किसी का घर मुझ में

क़ैद-ख़ाने में ख़ुश थे जो पंछी
उड़ते हैं अब इधर उधर मुझ में

कोहकन तोड़ता है जाने क्या
क्या बनाता है कूज़ा-गर मुझ में

तू ही इक दिन उजाड़ दे मुझ को
एक दिन तू ही बन-सँवर मुझ में

— Gulfam Ajmeri

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