चश्म उस की है और नज़ारा भी
मौज उस की है और किनारा भी
लौट कर फिर तू ही नहीं आया
हम ने तुझ को बहुत पुकारा भी
बज़्म से उस की हम को जाना था
और फिर मिल गया इशारा भी
एक ही शख़्स कैसे मुमकिन हैं
हो तुम्हारा भी और हमारा भी
ज़ख़्म भी अब तो ताज़े खा 'गुलफ़ाम'
इन से होता नहीं गुज़ारा भी
— Gulfam Ajmeri















