कितनों का दिल जला रक्खा है

सब को पागल बना रक्खा है

ग़म नहीं मैं अगर मर गया
सब को ही सच बता रक्खा है

कोई ख़तरा नहीं अब हमें
दर पे ताला लगा रक्खा है

इतने भी हम नहीं हैं शरीफ़
जितना हल्ला मचा रक्खा है

वरना कट जाए दो ख़ानदान
राज़ हम ने छिपा रक्खा है

क़त्ल जिस का अभी बाक़ी है
वो जनाज़ा उठा रक्खा है

जो भी पीता है फट पड़ता है
जाम में क्या मिला रक्खा है

— Gulfam Ajmeri

More by Gulfam Ajmeri

Other ghazal from the same pen

See all from Gulfam Ajmeri →

Raaz Shayari

Shers of raaz.

All Raaz Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling