कोई जब गाने लगता है भजन आहिस्ता आहिस्ता
हो जाती ख़त्म है मेरी थकन आहिस्ता आहिस्ता
मुझे अब हिज्र में तेरे तिरी यादों से ख़तरा है
ये मिल कर नोंच लेती हैं बदन आहिस्ता आहिस्ता
मिरे मौला किसी भी हाल में मुझ को अता कर मौत
लगी है बढ़ने अब मेरी घुटन आहिस्ता आहिस्ता
कोई आया नहीं सुन कर ख़बर मेरी क़ज़ा की और
किसी ने खेंच कर देखा कफ़न आहिस्ता आहिस्ता
— Gulfam Ajmeri















