
ये मैं ने कब कहा कि बस मुझी से राब्ता रहे
अगर जो कुछ नहीं है तो मिरी जाँ फ़ासला रहे
तेरे दिए हुए वो सारे फूल सूख जाने हैं
तेरा दिया हुआ ये ज़ख़्म तो हरा भरा रहे
— Kumar gyaneshwar
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