दूर होते हुए साग़र नहीं देखे जाते
होश में हिज्र के मंज़र नहीं देखे जाते
तुझ को सोचूॅं तो नमी आँख में आ जाती है
बिन तिरे ख़्वाब भी पल भर नहीं देखे जाते
क्यूँ करूँ ज़िक्र मैं सपनों के बिख़र जाने का
घाव हो सुर्ख़ तो छू कर नहीं देखे जाते
हर तरफ़ ख़ून है रिसता कोई रोको इनको
नौजवाॅं हाथ में ख़ंजर नहीं देखे जाते
हम कि उस उम्र में आ कर खड़े हैं आज अंबर
हुस्न कैसा भी हो तेवर नहीं देखे जाते
— Happy Srivastava 'Ambar'















