“मौन“

इक शख़्स था उलझा हुआ बहका हुआ
हर बात में हर हर्फ़ को गढ़ता हुआ

इक रोज़ वो शाइ'र ख़मोशी बन गया
काग़ज़ क़लम के ख़ून में था सन गया

सब दंग थे वो ज़ौक़ में जलता रहा
हर दर्द को नग़्में बना कहता रहा

कुछ लोग जो उस के जनाज़े पर गए
वो कह रहे थे की सुख़न में मर गए

पर ये कहानी कुछ अलग सी थी सनम
कुछ काग़ज़ों को देख कर बोली क़लम

इस मौन की है मौत में असली ख़ता
जिस मौन ने हर दर्द को रोके रखा
इस
में सुख़न के ताब की कैसी ख़ता

पीछे पलट पन्ने बताने को हुई
कुछ दर्द शाइ'र की दिखाने को हुई

छोटे अभी हो चुप रहो पढ़ने चलो
इतने बड़े हो कुछ बड़ों जैसे ढलो

तुम कुछ नहीं कर पाओगे पीछे हटो
ये खेल भी बस का नहीं आगे बढ़ो
कुछ रंग पर भी ध्यान दो गोरे बनो

देखो फ़ुलाँ के रैंक को कुछ शर्म है
मंदिर नहीं जाते कभी कोई धर्म है

तानों तले वो दब गया रोने लगा
काग़ज़ पर अपने घाव को कहने लगा

रोने लगा कहने लगा सुन लो ज़रा
सुन लो ज़रा कैसे कोई बच्चा मरा

फिर दर्द इक नासूर सा बनने लगा
वो काग़ज़ों में मौन को कहने लगा

जिस रोज़ 'अंबर' ख़ाक में था रम गया
उस रोज़ इक शाइ'र ख़मोशी बन गया

— Happy Srivastava 'Ambar'

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