लाश बनते हुए परिंदों को
देख सह
में हुए परिंदों को
क्या उदासी का इल्म होता है
दूर उड़ते हुए परिंदों को
ये बड़े दिन के बा'द देखा है
इतना हँसते हुए परिंदों को
पागलों सा पुकारता हूँ मैं
आते जाते हुए परिंदों को
ऊँची परवाज़ का सिला क्या है
पूछ उजड़े हुए परिंदों को
ज़िंदगी भर मलाल रहता है
इन बिछड़ते हुए परिंदों को
ख़ैर उड़ने को आसमाँ भर है
दुनिया जीते हुए परिंदों को
उस तरफ़ कौन मोह लेता है
मेरे भेजे हुए परिंदों को
— Ajay Kumar















