रो रो कर मेरा दिल मुझ से कहता है

ज़ुल्म मुझी पे ही क्यूँ होता रहता है

उस के दिल का किराएदार मैं था पहले
अब उस के दिल में कोई और रहता है

तेरी यादों का जो एक समुंदर है
हर इक शब मेरी आँखों से बहता है

सोल्यूशन नइँ लोग नसीहत देते हैं
इश्क़ जो भी करता है दुख में रहता है

तू है हुसैन का परचम लहराने वाला
तू क्यूँ ज़ुल्म ज़माने भर का सहता है

किस के पास सुकूँ से जा के बैठूँ मैं
दर्द लिए तू अपना बैठा रहता है

— Irshad Siddique "Shibu"

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