वो मेरी नींद तो मैं उस का ख़्वाब बन जाऊँ

मैं उस के लम्हों की पूरी किताब बन जाऊँ

ख़ुदाया मुझ को नसीब ऐसा कोई रोज़ भी हो
अगर वो प्यासी रहे तो मैं आब बन जाऊँ

वो इक सवाल है जिस का कोई जवाब नहीं
मगर हो क्या ही जो उस का जवाब बन जाऊँ

है एक शम्मा जो जलती है सुर्ख़ सूरज सी
मैं उस का मोम बनूँ उस का ताब बन जाऊँ

वो मय-कदे में जो आए तो काश ऐसा हो
मैं उस के जाम की छलकी शराब बन जाऊँ

लिबास अपने बदन पर हया का रखती है
जड़ा लिबास में हीरा नयाब बन जाऊँ

वो इक फ़लक है समेटे हुए सितारों को
मैं उस फ़लक का कोई माहताब बन जाऊँ

— Ishq Allahabadi

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