kar ke sochta hooñ jaazib ye kya kiya maine | कर के सोचता हूँ 'जाज़िब' ये क्या किया मैंने

  - Chandan Sharma

कर के सोचता हूँ 'जाज़िब' ये क्या किया मैंने
क्यूँ ज़माने के आगे आइना किया मैंने

लोग करते हैं सजदे उस ख़ुदा का उल्फ़त में
एक शख़्स को उल्फ़त में ख़ुदा किया मैंने

ख़ुद से मैं मिलूँगा जब एक बात पूछूँगा
बे-वफ़ाई के बदले क्यूँ वफ़ा किया मैंने

यूँँ तो हम दोनों को अहद ए वफा़ निभानी थी
तुम मुकर गई पर, अपना कहा किया मैंने

मुझ को अपनी तन्हाई में अकेले रहना था
और क्या फिर ख़ुद को ख़ुद से जुदा किया मैंने

तुझ से बे-वफ़ाई हम करते भी तो कैसे जाँ
सो हरिक दफ़ा ख़ुद से ही दग़ा किया मैंने

है ख़फा-ख़फा मुझ से ज़िंदगी ये मेरी क्यूँ?
मौत से इस जीस्त पर मशवरा किया मैंने

मुझ पे हक़ तुम्हारा बे-हद है प्यार के नाते
सो हो के तुम्हारा कुछ हक़ अदा किया मैंने

तुझ से इश्क़ करना ही था अजाब सा मुझ को
हैफ़ इक यही ग़लती बारहा किया मैंने

कौन ढूँढता जा के शादमानी ग़म रहते
ग़म से दिल-लगी कर ली क्या बुरा किया मैंने

वस्ल हिज्र मिल कर था खेल दो पल का सारा
मुख़्तसर से उस किस्से को बड़ा किया मैंने

बात रख के मेयारी नज़्म ओ ग़ज़लों में अपनी
ख़ुद ही ख़ुद के ख़ातिर मसला खड़ा किया मैंने
©चन्दन शर्मा "जाज़िब"

बह्र-212 1222 212 1222

  - Chandan Sharma

Qabr Shayari

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