इतना भी अब हक़ीर नईं होनादो दिलों की लकीर नईं होनातेरा लहजा बदल गया है दोस्ततेरे जैसा अमीर नईं होनामुझ पे रब की बड़ी इनायत हैतेरे दर का फ़क़ीर नईं होनासारे ज़ालिम ये सोचते होंगेरब्त-ए-मुंकर-नकीर नईं होनाइतना काफ़ी है लोग सुनते हैंमुझ को 'ग़ालिब' या 'मीर' नईं होना— Junaid Shaad