ख़्वाबों की क़ीमत

ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरें
शरीर से बाहर की ओर भागती नसें
इन्हें देख कर मन व्यथित हो उठता है
देख कर एहसास होता है कि
ज़िन्दगी का एक पहलू ऐसा भी है
जहाँ सिर्फ़ दो पहर की रोटी कमाकर
इंसान सितारों संग सुकून से सोता है
ये सुकून दो वक़्त की रोटी कमाकर आता है
या फिर अपनी आँखों के ख़्वाबों को बेचकर

वो सारे ख़्वाब जो बचपन के वक़्त
मासूम आँखों में समा जाते हैं
जिन्हें ज़िंदा रख हम तुम
ज़िन्दगी गुज़ारते चले जाते हैं
ये सोच कर एक और सवाल
मेरे ज़ेहन में आ पड़ता है कि
किस
में ज़्यादा दर्द है
ख़्वाबों को मारने में
या उन्हें बेचने में

किस
में ज़्यादा ना-उम्मीदी है
कौन इंसान को जीते जी मार देता है
आख़िर कौन
ख़्वाबों को मार देना
या उन्हें बेच देना

इन्हीं सवालों में झुलसा हुआ
एक सवाल सा झूल रहा हूँ मैं
इस झूले में
जो उलझी रस्सी के सहारे लटका है
और इस झूले से लटका हुआ मैं
ज़िन्दगी को परत दर परत खोलने की फ़िराक़ में
ज़िंदा हूँ
इन्हीं कुछ जाएज़ सवालों के साथ
ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरों के साथ
शरीर से बाहर की ओर भागती नसों के साथ
मैं ज़िंदा हूँ

— Saurabh Yadav Kaalikhh

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