"मैं जो मर जाऊँ कभी"

मैं जो मर जाऊँ कभी
मेरे बदन को कफ़न से नहीं
तुम डाइरी के पन्नों से ढकना
मेरी लाश पर लकड़ी नहीं
मेरे कमरे की किताबों को तह करना
मैं जो मर जाऊँ कभी
बिल्कुल आँसू मत बहाना

अगर आँसू बहेंगे
मेरे साथ मेरी नज़्में भी मर जाएँगी
मेरी ग़ज़लें सर नहीं उठा पाएँगी
क्या तुम चाहते हो ये सब हो जाना
शख़्स के साथ
उस की शख़्सियत का मर जाना
मैं जो मर जाऊँ कभी
बिल्कुल आँसू मत बहाना

मेरी क़ब्र पर
हर रोज़ फूल वग़ैरह मत लाना
हफ़्ते में
कम-अज़-कम एक बार आ कर
कोई नज़्म सुनाना
कोई ग़ज़ल गुनगुनाना
मैं जो मर जाऊँ कभी
बिल्कुल आँसू मत बहाना

— Saurabh Yadav Kaalikhh

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