हक़ीक़त ख़ुद नहीं जब आशना तो क्या हक़ीक़त है
है यूँ इस दौर में या'नी के बे-पर्दा हक़ीक़त है
मेरी पहचान होना इक हक़ीक़त है भी अदना सी
मेरा गुमनाम होना पर बहुत आला हक़ीक़त है
वो जो इज़हार-ए-उल्फ़त था कहानी की ज़रूरत थी
ये जो तर्क-ए-त'अल्लुक़ है यही शैदा हक़ीक़त है
नज़र के सामने सारे मनाज़िर एक धोका थे
मगर वो एक मंज़र था जो पोशीदा हक़ीक़त है
हक़ीक़त से परे कुछ भी नहीं ये लोग कहते हैं
अगर ऐसा है तो फिर ये बताओ क्या हक़ीक़त है
— Kaif Uddin Khan















