ज़ीस्त की खोखली हैहात पे रह जाते हैंवो जो कमज़र्फ़ हैं, औक़ात पे रह जाते हैंओढ़ लेती है शराफ़त की रिदा रोज़ सहरऔर इल्ज़ाम फ़क़त रात पे रह जाते हैं— KARAN