KARAN

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@Karan_Kataria

KARAN shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in KARAN's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

शरफ़ मिला न कभी चाँद देखने का हमें वो ख़ुश-नसीब हैं, जो तुझ को देखते होंगे — KARAN

Ghazal

दुनिया ने बेकार समझकर फेंक दिया तुम ने भी तो ख़ैर ये गौहर फेंक दिया मुश्किल से तो ज़ब्त की आदत डाली थी उस ने फिर पानी में कंकर फेंक दिया मतलब तो था यार नशे से सो हम ने उस की आँखें देखी सागर फेंक दिया टूटा तो मैं एक से एक हज़ार हुआ ख़ूब ये तुम ने मुझ पर पत्थर फेंक दिया उस के हाथ में गुल-दस्ता था क्या करते हम ने अपने हाथ का ख़ंजर फेंक दिया फिर मेरी तफ़्सील कहाँ तक मुमकिन थी जिस ने मुझ को खोला पढ़कर फेंक दिया हाए मेरी प्यास की शिद्दत से जल कर उस ने मेरी सम्त समुंदर फेंक दिया उस की आमद ने ये ज़ुल्म किया मुझ पर तन्हाई के वज्द से बाहर फेंक दिया काश सितारा होता रौशन रहता मैं क्यूँ धरती पर बंदा-पर्वर फेंक दिया हम को उस ने काँटा-छाँटा ख़ूब 'करन' बस मतलब का रक्खा दीगर फेंक दिया — KARAN
एहसान फ़क़त इतना मेरी जान-ए-ग़ज़ल कर बे-कैफ़ तबीअत का मेरी मसअला हल कर जी चाहता है तुझ को वफ़ा कह के पुकारूँ या रख दूँ मुहब्बत मैं तेरा नाम बदल कर दो-तरफ़ा अज़ीयत में गिरफ़्तार हुए हैं इस इश्क़ में जलना भी है चलना भी सँभल कर ऐ ख़ालिक़-ए-आलम मैं परेशान बहुत हूँ तहरीर-ए-मुक़द्दर में मेरी फेर-बदल कर रस्ता कोई मंज़िल न कोई ठौर-ठिकाना मैं जाऊँ कहाँ आप के कूचे से निकल कर सुनते हैं कि जादू है तेरे लम्स में मोहसिन ज़ख़्मों को मेरे छू ले इन्हें शोख़ कँवल कर लिल्लाह सितमगर न कर अब और सितम यूँँ सैलाब न बन जाए ग़म-ए-इश्क़ उबल कर इस गर्मी-ए-वहशत में बदन ख़ाक न हो जाए पानी ही न बन जाए कहीं बर्फ़ पिघल कर फिर ख़्वाब दिखाना मेरी आँखों को मुसलसल पहले मेरी आँखों को 'करन' ख़्वाब-महल कर — KARAN
फूल बिखरा तो न ये सोच किधर जाएगा बनके ख़ुशबू-सा फ़िज़ाओं में बिखर जाएगा वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम नहीं होता पागल रहते-रहते यूँँ जुदा रब्त भी मर जाएगा जान ले लेगा यक़ीनन ग़म-ए-जानाँ मेरी कुछ घड़ी और अगर दिल में ठहर जाएगा हम-सफ़र बा'द तेरे कुछ नहीं बदलेगा मगर हाँ तेरे साथ मेरा शौक़-ए-सफ़र जाएगा जा-ब-जा सर न झुका होश में आ बात समझ बे-तरह दोस्त दु'आओं से असर जाएगा ग़ैर-मुमकिन है तेरे बा'द कहीं दिल न लगे सोच ले जाने से पहले तू अगर जाएगा इक मुसाफ़िर से नहीं ठीक लगाना दिल का जाने किस राह मुसाफ़िर ये गुज़र जाएगा इस मुहब्बत ने मुझे दी हैं ख़राशें इतनी आईना देख के सूरत मेरी डर जाएगा ढूँढ़ने लगते हैं दीवार-ओ-दर-ओ-बाम तुझे ऐ करन शाम ढले आज तो घर जाएगा — KARAN
घर से दफ़्तर और फिर दफ़्तर से घर काफ़ी है क्या ज़िन्दगी तू ही बता इतना सफ़र काफ़ी है क्या कौन समझेगा मेरी तन्हाइयों के मसअले है ज़माना यूँँ तो मेरे साथ पर काफ़ी है क्या आजकल मेरे त'आक़ुब में हैं आँखें यार की इब्तिदाई इश्क़ में इतना असर काफ़ी है क्या जल के मरना चाहिए था गर्मी-ए-इख़लास में हैफ़ दीवाना हुआ ख़स्ता-जिगर काफ़ी है क्या हुस्न तुझ में और थोड़ी दिल-कशी दरकार है आतिशी-अबरू क़यामत-सी नज़र काफ़ी है क्या इश्क़ मेरे और तुझ को क्या वज़ीफ़ा चाहिए देख आख़िर हो गया मैं दर-ब-दर काफ़ी है क्या फिर अनासिर ने बदल ली सूरत-ए-तरतीब और आलम-ए-हस्ती हुआ ज़ेर-ओ-ज़बर काफ़ी है क्या बे-दिली से आए थे हम भी कभी सहराओं में दिल तो याँ लगने लगा अपना मगर काफ़ी है क्या हाँ कभी झुकता न था ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के सामने तेरे सजदों में झुका जाता है सर काफ़ी है क्या क्या करूँँ ऐसा कि अपने दिल में वो रख ले मुझे ऐ करन ये शेर-गोई का हुनर काफ़ी है क्या — KARAN
अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं तुम ने इन आँखों का पानी देखा है इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे हम ने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम यूँँ तो तुम ने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिन का पेशा हम ने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ तू ने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं दर्द उठा कर भी सालिम हैं देख करन हम ने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं — KARAN
इश्क़ से थीं जो भी उम्मीदें, वो सारी बाँधकर फेंक आया हूँ कुएँ में, आज रस्सी बाँधकर हसरतें दिल की उसी छज्जे पे टाँग आया हूँ मैं माँ रखा करती थी, जिस छज्जे से रोटी बाँधकर ज़िन्दगी जीने की ख़ातिर चल रहे हैं, इन दिनों रस्सियों पर, लोग सब आँखों पे पट्टी बाँधकर बद-हवा सेी पर मेरी, दरिया बड़ा हैरान था आ गया इस पार मैं, उस पार कश्ती बाँधकर रब्ते-बाहम का निकालूँ फिर कोई मैं रास्ता फिर कबूतर भेज दूँ, पैरों में चिट्ठी बाँधकर ढूँढ़ने निकला था जब मैं घर से, ख़ुशियों का सुराग़ ताक़ पर रखदी थी मैं ने, तब उदासी बाँधकर ख़ामुशी से मैं चला आया था, उस के शहर से देखती वो रह गई थी, टकटकी-सी बाँधकर चंद अफ़साने वफ़ा के, और कुछ टूटे-से ख़्वाब रास्ते में रख गया कोई शराबी, बाँधकर तोड़ कर पिंजरा, करन, उड़ना बहुत आसान था पर मुझे रखती है, उस की 'ख़ुश-क़लामी बाँधकर — KARAN
नम की तफ़सीलों पर क़ायम, आँसू थे तुम कहते हो, आबे-ज़मज़म? आँसू थे ख़्वाबों की कश्ती में बैठे, पार हुए जिस को दरिया समझे थे हम, आँसू थे एक सुकूत, लबों पर तारी था, उस के और निगाहों में, बस पैहम आँसू थे उस ने जाने कैसे पहचाना होगा बारिश के पानी में मुदग़म, आँसू थे कैसे होते ज़ख़्म दवाओं से अच्छे जब मेरे ज़ख़्मों का मरहम, आँसू थे ओस की सूरत, जो बिखरे थे, फूलों पर क़तरा-क़तरा, शबनम-शबनम, आँसू थे कौन अज़ादारों में शामिल था मेरे मेरी मर्ग थी, मेरा मातम, आँसू थे तू आँखों का पानी कहता रह इनको मैं सीधा कहता हूँ, हम-दम, आँसू थे आज बताता हूँ, सागर क्यूँ खारा है सागर में, इक रोज़ फ़राहम, आँसू थे बिछड़े थे जिस रोज़ 'करन' क्या मंज़र था दोनों की आँखों में बाहम, आँसू थे — KARAN
वस्ल की शाम अधूरी भी हो सकती है और मुसलसल दूरी भी हो सकती है मत रहना इस वहम में हर्गिज़ दीवानों रोज़, तमन्ना पूरी भी हो सकती है बिरहन-सी जो रात है, उतरी आँगन में तुम आओ, सिंदूरी भी हो सकती है तुम अंदाज़ लगाते रहना चाहत के नूर में इक बे-नूरी भी हो सकती है आज मसाइल इश्क़ में बढ़ते जाते हैं शायद, उन सेे दूरी भी हो सकती है इश्क़ महकता है, चंदन हो सकता है साँसों में कस्तूरी भी हो सकती है दीवाने हैं, दीवानों को दुनिया क्या धड़कन, ग़ैर-ज़रूरी भी हो सकती है इश्क़ है यारो, इश्क़ में हों बदनाम अगर रुस्वाई, मशहूरी भी हो सकती है आज मुहब्बत, शेवा है उस का लेकिन कल कोई, मजबूरी भी हो सकती है खोट करन कुछ तेरे इश्क़ में भी होगा कुछ उस की मगरूरी भी हो सकती है — KARAN
कहाँ पे जी के फफोले फोड़ें कहाँ पे दिल का मवाद रक्खें अजब तज़ब्ज़ुब में जाँ फँसी है उसे भुलाएँ कि याद रक्खें न दिल में रक्खें न दिल ही रक्खे फ़क़त मुहब्बत का पास रख लें वफ़ा के पुर्ज़े हवा की ज़द में उन्हें कहो मेरे बा'द रक्खें हर एक बुत है जफ़ा का पैकर हज़ार पर्दे हज़ार शक्लें कोई वफ़ा पर ख़रा नहीं है किसी पे क्या ए'तिमाद रक्खें जदीद लहजे के लोग हैं ये नया ज़माना नई कहानी मैं हूँ तवारीख़ का फ़साना ये लोग क्या मुझ को याद रक्खें गली गली में हर एक लड़की हमारे लहजे पे मर मिटी है बताओ अब किस का दिल दुखाएँ बताओ अब किस को शाद रक्खें ख़ुदा बचाए अब ऐसे लोगों से जिन की फ़ितरत ही दो-मुँही हो ज़बान शक्कर के जैसी मीठी दिलों में फ़िक्र-ए-इनाद रक्खें हैं भाई-चारे के हम तो हामी मोहब्बतों के मुरीद हैं हम हमें ग़रज़ क्या है अपने दिल में जो क़स्द-ए-शोर-ओ-फ़साद रक्खें तमाम शर्तें क़ुबूल उन की वो जिस पे राज़ी मैं उस पे राज़ी 'करन' ख़सारे तमाम मेरे वो अपने हिस्से मफ़ाद रक्खें — KARAN
हम ने तो ख़ूब ज़ब्त से टाले निकल पड़े सँभले नहीं ये अश्क सँभाले निकल पड़े किस को रहा है दोस्त यूँँ घर छोड़ने का शौक़ हम तो ज़रूरतों के निकाले निकल पड़े जब उस ने रफ़्ता-रफ़्ता यहाँ घर बना लिया मायूस हो के क़ल्ब से जाले निकल पड़े किस ने कुरेद डाली मेरे जुगनुओं की राख तीरा-शबी की तह से उजाले निकल पड़े उस ने जो तर्क-ए-इश्क़ का ऐलान कर दिया मेरे जिगर पे सैकड़ों छाले निकल पड़े हम तो समझ रहे थे तुम्हें अपनी मिल्कियत लेकिन ये किस के नाम क़बाले निकल पड़े फूलों में रंग-ओ-रस की कोई बात छिड़ गई ले-दे के याँ भी तेरे हवाले निकल पड़े। जब हद से बढ़ गईं तेरी ज़र्रा-नवाज़ियाँ आख़िर मेरी ज़बान से नाले निकल पड़े लश्कर उदासियों का मुक़ाबिल जो आ गया अपनी क़बाएँ कस के जियाले निकल पड़े जब बज़्म से हम उस की निकाले गए 'करन' हम ने ख़ुतूत उस के उछाले निकल पड़े — KARAN
सूरज ग़ुरूब हो गया अख़्तर निकालिए इस तीरगी का ज़ेहन से अब डर निकालिए अच्छे बने रहे तो निगल जाएगा जहाँ ये गुल-फ़िशानी छोड़िए पत्थर निकालिए इस राएगानी से तो कोई काम लीजिए बहर-ए-फ़ुग़ाँ की तह से भी गौहर निकालिए नुस्ख़ा कोई निजात-ए-मुहब्बत का ढूँढिये जादू कोई या टोना या मंतर निकालिए तन्हा उदास रूह असीर-ए-अज़ाब है इस को बदन की क़ैदस बाहर निकालिए असरार मेरी ज़ात के खुल ही गए तो फिर अब ऐब इन में ढूँढ़ के दिन-भर निकालिए खो ही न जाए अब कहीं गर्द-ओ-ग़ुबार में दश्त-ए-जुनूँ की ख़ाक से शाइ'र निकालिए नाकाम इश्क़ में हैं तो कुछ काम कीजिए रूमाल को झटक के कबूतर निकालिए अब आख़िरी पड़ाव है मेरी भी प्यास का फिर क्या ग़रज़ जो बा'द में सागर निकालिए जाए नज़र जहाँ भी करन इश्क़-इश्क़ हो ऐसा भी आख़िरश कोई मंज़र निकालिए — KARAN
ग़मों के 'आदाब, निभ रहे हैं, मैं गिर रहा हूँ, सँभल रहा हूँ यूँँ ख़ुद को देता हूँ, मैं तसल्ली, बदल गया हूँ, बदल रहा हूँ हज़ार शक़्लें बदलते रहते हैं, दोस्त! हालात ज़िन्दगी में वही सुकूँ कह रहा है मुझ को, मैं जिस की ख़ातिर ख़लल रहा हूँ कमाल है उस की सोहबतों में, अजीब जादू है उस की क़ुरबत मैं उस की रंगत में ढलके, लहजे से अपने बाहर निकल रहा हूँ किसी के हिस्से में आ गया है, किसी के हिस्से का प्यार आख़िर अगरचे मैं आज हूँ किसी का, मगर किसी का मैं कल रहा हूँ ये हस्बे-उम्मीद तो नहीं पर, लिखे पे किस का है ज़ोर साहिब मेरा मुक़द्दर, चराग़ बनकर, मज़ारे-उल्फ़त पे जल रहा हूँ मुझे तो, मरने के बा'द भी कुछ, सुकून हासिल नहीं हुआ है मैं बिस्तरे-ख़ाके-नम पे सोया हुआ भी, करवट बदल रहा हूँ बड़ी ही ज़ालिम 'रिवायतें हैं, 'रक़ाबतों की 'मोहब्बतों में वो 'ग़ैर बाहों में 'मुतमइन हैं, मैं 'दस्ते-हसरत मसल रहा हूँ ज़रूर आसेब है कोई ये, बला है, आज़ार है मुहब्बत मैं जानता हूँ कि आग है ये, मैं जिस की ख़ातिर मचल रहा हूँ मेरे तो बस में रहा नहीं कुछ, नहीं हैं आसार वापसी के करन! ख़ुदा ही बचाए अब तो, मैं ऐसे रस्तों पे चल रहा हूँ — KARAN
अपने पैरों में, 'मुहब्बत का 'असर बाँध के हम घर से निकलेंगे, 'सर-ए-शाम 'कमर बाँध के हम कितनी ही सख़्तियाँ, 'पेश आएँ मगर आएँगे आप की सम्त अब 'एहराम-ए-सफ़र बाँध के हम जिस की नज़रों के, 'मुक़ल्लिद' रहे हैं हम बरसों छोड़ आए उसी 'साहिर की, 'नज़र बाँध' के हम हम ने 'वीरान जो देखीं, तो तेरी आँखों में आ गए, कितने हसीं 'ख़्वाब-नगर' बाँध के हम गर कहीं आप को मिल जाएँ, ख़बर कर देना जाने रख आए भला ख़ुद को किधर बाँध के हम ख़ैर ''उम्मीद-ए-मुहब्बत" थी, मगर लौट आए आप के 'शहर से दामन में, 'शरर बाँध के हम छोड़ कर 'आलम-ए-फ़ानी तो है जाना 'बर-हक़ साथ ले जाएँगे सब 'ऐबो-हुनर बाँध के हम हाए! कटती ही नहीं, ''हिज्र की तन्हा रातें वस्ल की 'काश कि ला पाते, ''सहर बाँध के हम डूब जाने से तो बेहतर था, सफ़ीना-ए-दिल साथ ले आएँ किनारे पे, 'भँवर बाँध के हम तीरगी हम को करन, भाने लगी है यकसर चल! छुपा देते हैं, ये 'शम्सो-क़मर' बाँध के हम — KARAN
अपना ग़म, अपना सरमाया होता है मुश्किल में, हर शख़्स पराया होता है अपने बख़्त की, ये 'हुश्यारी है, साहिब रोज़, हुनर गलियों में ज़ाया' होता है आगे-आगे चलती है, ये तन्हाई पीछे-पीछे, अपना 'साया होता है रोज़ सु'बह फिर तुझ को पाने की चाहत रात गए तक दिल, समझाया होता है मय-ख़ाने की 'चौखट पर आ मिलते हैं इश्क़ ने जिन को भी, ठुकराया होता है सच कहता हूँ, उस पागल सी लड़की ने पर्दे में इक 'चाँद, छुपाया होता है चारा-साज़ो! उस का मरहम क्या होगा ज़ख़्म 'मुहब्बत में जो, खाया होता है देख करन उस बज़्म में मत पढ़ना ग़ज़लें नक़्क़ादों ने जाल, बिछाया होता है — KARAN
टूटने की ज़द में, 'रिश्ता चल रहा है आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है रात भर आँसू, नहीं थमते हमारे चल रहा है ख़ैर! जैसा चल रहा है इश्क़, पहले था कभी, नामे-ख़ुदा पर अब दिखावा है, दिखावा चल रहा है हिर्स, मक्कारी, फ़रेब और नफ़रतों का जिस तरफ़ देखो, तमाशा चल रहा है थक चुका, पर मंज़िलों के ज़ौक़ में ही ये मुसाफ़िर, आबला-पा चल रहा है रात लहरा कर चली है, 'दश्त में अब ख़्वाब, आँखों में, 'सुहाना चल रहा है इश्क़ की शतरंज का है, वो 'पियादा चाल सीधी, हो के टेढ़ा चल रहा है सोचता हूँ, मैं भी उस के साथ हो लूँ क़ैस सहरा में, अकेला चल रहा है ऐ 'ख़ुदा! दुनिया तेरी, कितनी हसीं थी देख अब दुनिया में, क्या क्या चल रहा है हैं मुनाफ़े में, 'सियासत की दुकानें झूठ के दम पर, ये धन्धा चल रहा है ख़ाक हैं, सच्ची वफ़ा वाले जहाँ में बस अदाकारों का, सिक्का चल रहा है पूछते हो क्या, हमारा हाल दिलबर इश्क़ में जैसा है, अच्छा चल रहा है ख़ूब मुश्किल है, यूँँ चलना रस्सियों पर बाज़ी-गर तेरा, 'भरोसा चल रहा है उस ने ही तौफ़ीक़ दी, तो मुतहर्रिक हैं वो चलाता है, खिलौना चल रहा है ऐ करन! अब ऐसे, दुनिया चल रही है अंधे के पीछे जूँ, अंधा चल रहा है — KARAN
दिलो-जाँ की 'फ़ज़ीहत है मोहब्बत, मान भी जाओ अज़ीयत बस अज़ीयत है मोहब्बत, मान भी जाओ बहुत मोहतात तुम रहना, रहे-उल्फ़त में दीवानो मुजस्सम, इक क़यामत है मोहब्बत, मान भी जाओ कोई दिन थे, हुआ करती थी शहज़ादी ये ख़्वाबों की मगर अब सिर्फ़ ज़िल्लत है मोहब्बत, मान भी जाओ नफ़ा'-नुक़सान तकते हैं, "वफ़ा अब कौन करता है अजी! सच है "तिजारत है मोहब्बत, मान भी जाओ कहानी 'क़ैसो-कोहकन की, ज़रा इक बार पढ़ लेना बड़ी ग़मनाक 'इबरत है मोहब्बत, मान भी जाओ मसर्रत कह रहे हो तुम, मगर हम जानते हैं दोस्त ग़मे-जाँ की, 'वज़ाहत है मोहब्बत, मान भी जाओ यही मिसरा लिखा देना, करन की लौहे-तुर्बत पर बड़ी 'रंगीन वहशत है मोहब्बत, मान भी जाओ — KARAN

Nazm

"एक लड़की" बुलंद क़ामत की एक लड़की बिखेरती खुशबुएँ बदन की मेरी निगाहों की रहगुज़र से गुज़र गई है गरीब-मुफ़लिस किसी कुटी का है चाँद शायद है ख़ूब-सूरत, फ़टे-पुराने लिबास में भी बला की सुंदर ज़रा सा मेरे क़रीब आ कर हसीं लबों से यूँँ मुस्कुरा कर तमाम आलम को ख़ुशबुओं से वो भर गई है जबीं कुशादा चमक रही है कमर भी उस की है शाख जैसी लचक रही है लबों पे बिखरा हुआ तबस्सुम सियाह गेसू भी उस बदन से लिपट रहे हैं यूँँ जैसे कोई शजर से लिपटी हो बेल जैसे क़दम-क़दम पे ज्यूँ फूल खिलते हैं सुर्ख़ गोया, जिधर गई है वो जिस्मे-नाज़ुक तराश जिस की हो गोया हीरा वो बेश-क़ीमत हर इक अदा में ग़ज़ब की है शबनमी लताफ़त किसी परी-वश से ख़ूबसरत सुख़नवरों के ख़याल-सी है कि सुर्ख़-रू उस हसीन की मैं मिसाल क्या दूँ गुलाल-सी है निगाह ख़ंजर, अदाएँ क़ातिल कमाल लहजा, बस इक नज़र से मेरे जिगर में उतर गई है मैं हूँ एक शाइ'र सो मुझ को उस में ग़ज़ल दिखी है लगा है मुझ को कि जैसे बादे-सबा उसे गुनगुना रही है मगर वो लड़की जिसे गुमाँ तक नहीं है शायद ये हुस्न उस पर ही बोझ बन जाएगा यक़ीनन उसे कहो कि नक़ाब में रक्खे हुस्नो-इस्मत वगरना पछताएगी बा'द में वो वो मर्द कहते हैं जो यहाँ पर वो ख़ुद को साबित करेंगे बेशक दिखाएँगे उस गरीब पर ही वो ज़ोर अपनी मर्दानगी का करेंगे ज़ाहिर वो पाक-दामन को तार कर के कि मर्द हैं हम न उस में उन को दिखेगा बेबस बुज़ुर्ग आँखों का इक सितारा उन्हें फ़क़त वो फ़टे लिबासों से झाँकता इक बदन दिखेगा हवस-कदे में, पड़ी मिलेगी बस एक उरियाँ वो लाश बन कर न मर्द की शक्ल में उन दरिंदों को उस में कोई बहन दिखेगी न माँ दिखेगी, न कोई बेटी न उन को उस में ग़ज़ल दिखेगी न शा'इरी ही — KARAN