KARAN

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    घर से दफ़्तर और फिर दफ़्तर से घर काफ़ी है क्या
    ज़िन्दगी तू ही बता इतना सफ़र काफ़ी है क्या

    कौन समझेगा मेरी तन्हाइयों के मसअले
    है ज़माना यूँ तो मेरे साथ पर काफ़ी है क्या

    आजकल मेरे तआक़ुब में हैं आँखें यार की
    इब्तिदाई इश्क़ में इतना असर काफ़ी है क्या

    जल के मरना चाहिए था गर्मी-ए-इख़लास में
    हैफ़ दीवाना हुआ ख़स्ता-जिगर काफ़ी है क्या

    हुस्न तुझ में और थोड़ी दिल-कशी दरकार है
    आतिशी-अबरू क़यामत-सी नज़र काफ़ी है क्या

    इश्क़ मेरे और तुझको क्या वज़ीफ़ा चाहिए
    देख आख़िर हो गया मैं दर-ब-दर काफ़ी है क्या

    फिर अनासिर ने बदल ली सूरत-ए-तरतीब और
    आलम-ए-हस्ती हुआ ज़ेर-ओ-ज़बर काफ़ी है क्या

    बे-दिली से आए थे हम भी कभी सहराओं में
    दिल तो याँ लगने लगा अपना मगर काफ़ी है क्या

    हाँ कभी झुकता न था ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के सामने
    तेरे सजदों में झुका जाता है सर काफ़ी है क्या

    क्या करूँ ऐसा कि अपने दिल में वो रख ले मुझे
    ऐ करन ये शेर-गोई का हुनर काफ़ी है क्या

    KARAN
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    जहालतों का वो मातम मना के लौट गए
    ज़हीन लोग थे चेहरा छुपा के लौट गए

    न रास आई उन्हें रौनकें ज़माने की
    चिराग़े-दहर वो सारे बुझा के लौट गए

    अजीब किस्म के ताजिर थे वो मेरे भाई
    बिका न कुछ तो दुकानें बढ़ा के लौट गए

    सियासतों का ये धंधा कमाल है साहिब
    तरह तरह के भरोसे दिला के लौट गए

    रक़ाबतों के ये कैसे उसूल थे वो भी
    जो बुझ सके न तो हमको जला के लौट गए

    न सिरफ़िरा कोई पाओगे आप हम जैसा
    फ़राज़ो-रुतबा-ओ-शोहरत लुटा के लौट गए

    करन ये बात तो सच है कि तू दीवाना है
    मगर वो लोग जो दामन बचा के लौट गए

    KARAN
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    "एक लड़की"

    बुलंद क़ामत की एक लड़की
    बिखेरती खुशबुएँ बदन की
    मेरी निगाहों की रहगुज़र से
    गुज़र गयी है
    ग़रीब-मुफ़लिस किसी कुटी
    का है चाँद शायद
    है ख़ूबसूरत, फ़टे-पुराने
    लिबास में भी बला की सुंदर
    ज़रा सा मेरे क़रीब आकर
    हसीं लबों से यूँ मुस्कुराकर
    तमाम आलम को ख़ुशबुओं से
    वो भर गई है
    जबीं कुशादा चमक रही है
    कमर भी उसकी है शाख जैसी
    लचक रही है
    लबों पे बिखरा हुआ तबस्सुम
    सियाह गेसू भी उस बदन से
    लिपट रहे हैं
    यूँ जैसे कोई शजर से
    लिपटी हो बेल जैसे
    क़दम-क़दम पे
    ज्यों फूल खिलते हैं सुर्ख़
    गोया, जिधर गयी है
    वो जिस्मे-नाज़ुक
    तराश जिसकी हो गोया
    हीरा वो बेश-क़ीमत
    हर इक अदा में
    ग़ज़ब की है शबनमी लताफ़त
    किसी परी-वश से ख़ूबसरत
    सुख़नवरों के ख़याल-सी है
    कि सुर्ख़-रू उस हसीन की
    मैं मिसाल क्या दूँ
    गुलाल-सी है
    निगाह खंजर, अदाएँ क़ातिल
    कमाल लहजा, बस इक नज़र से
    मेरे जिगर में उतर गई है
    मैं हूँ एक शायर सो मुझको
    उसमें ग़ज़ल दिखी है
    लगा है मुझको कि जैसे बादे-सबा
    उसे गुनगुना रही है
    मगर वो लड़की जिसे गुमाँ तक
    नहीं है शायद
    ये हुस्न उस पर ही बोझ
    बन जाएगा यक़ीनन
    उसे कहो कि
    नक़ाब में रक्खे हुस्नो-इस्मत
    वगरना पछताएगी बाद में वो
    वो मर्द कहते हैं जो यहाँ पर
    वो ख़ुद को साबित करेंगे बेशक़
    दिखाएँगे उस ग़रीब पर ही
    वो ज़ोर अपनी मर्दानगी का
    करेंगे ज़ाहिर वो
    पाक-दामन को तार करके
    कि मर्द हैं हम
    न उसमें उनको दिखेगा
    बेबस बुज़ुर्ग आँखों का
    इक सितारा
    उन्हें फ़क़त वो फ़टे लिबासों से
    झाँकता इक बदन दिखेगा
    हवस-कदे में, पड़ी मिलेगी
    बस एक उरियाँ वो लाश बन कर
    न मर्द की शक्ल में उन दरिंदों को
    उसमें कोई बहन दिखेगी
    न माँ दिखेगी, न कोई बेटी
    न उनको उसमें ग़ज़ल दिखेगी
    न शाइरी ही

    KARAN
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    अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं
    बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं

    तुमने इन आँखों का पानी देखा है
    इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं

    गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है
    ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं

    सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें
    गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं

    सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे
    हमने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं

    मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम
    यूँ तो तुमने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं

    दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिनका पेशा
    हमने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं

    इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ
    तूने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं

    दर्द उठाकर भी सालिम हैं देख करन
    हमने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं

    KARAN
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    आया, क़रीब बैठ के कहने लगा कि बस
    इतना ही सिर्फ़ हमसे तुम्हें प्यार था कि बस

    होंठो का लम्स था कि नशा था शराब का
    उसने लबों पे आज यूँ बोसा रखा कि बस

    KARAN
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    शरफ़ मिला न कभी चाँद देखने का हमें
    वो ख़ुश-नसीब हैं, जो तुझको देखते होंगे

    KARAN
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    टूटने की ज़द में, 'रिश्ता चल रहा है
    आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है

    रात भर आँसू, नहीं थमते हमारे
    चल रहा है ख़ैर! जैसा चल रहा है

    इश्क़, पहले था कभी, नामे-ख़ुदा पर
    अब दिखावा है, दिखावा चल रहा है

    हिर्स, मक्कारी, फ़रेब और नफ़रतों का
    जिस तरफ़ देखो, तमाशा चल रहा है

    थक चुका, पर मंज़िलों के ज़ौक़ में ही
    ये मुसाफ़िर, आबला-पा चल रहा है

    रात लहरा कर चली है, 'दश्त में अब
    ख़्वाब, आँखों में, 'सुहाना चल रहा है

    इश्क़ की शतरंज का है, वो 'पियादा
    चाल सीधी, हो के टेढ़ा चल रहा है

    सोचता हूँ, मैं भी उसके साथ हो लूँ
    क़ैस सहरा में, अकेला चल रहा है

    ऐ 'ख़ुदा! दुनिया तेरी, कितनी हसीं थी
    देख अब दुनिया में, क्या क्या चल रहा है

    हैं मुनाफ़े में, 'सियासत की दुकानें
    झूठ के दम पर, ये धन्धा चल रहा है

    ख़ाक हैं, सच्ची वफ़ा वाले जहाँ में
    बस अदाकारों का, सिक्का चल रहा है

    पूछते हो क्या, हमारा हाल दिलबर
    इश्क़ में जैसा है, अच्छा चल रहा है

    ख़ूब मुश्किल है, यूँ चलना रस्सियों पर
    बाज़ी-गर तेरा, 'भरोसा चल रहा है

    उसने ही तौफ़ीक़ दी, तो मुतहर्रिक हैं
    वो चलाता है, खिलौना चल रहा है

    ऐ करन! अब ऐसे, दुनिया चल रही है
    अंधे के पीछे जूँ, अंधा चल रहा है

    KARAN
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    दर्द का आलम सुनहरा, भेज दे
    काश माज़ी, लुत्फ़-ए-ईज़ा भेज दे

    वाक़या, दिल टूट जाने का मेरे
    और तेरे ज़ुल्मों का, किस्सा भेज दे

    KARAN
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    ज़ीस्त की खोखली हैहात पे रह जाते हैं
    वो जो कमज़र्फ़ हैं, औक़ात पे रह जाते हैं

    ओढ़ लेती है शराफ़त की रिदा रोज़ सहर
    और इल्ज़ाम फ़क़त रात पे रह जाते हैं

    KARAN
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    मत करो बे-लिबास, रहने दो
    इन ज़मीनों पे, घास रहने दो

    बढ़ते शहरों की, वहशतें रोको
    ये ज़मीं, ख़ुश-लिबास रहने दो

    KARAN
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