KARAN
KARAN
Ghazal

अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं

बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं

तुम ने इन आँखों का पानी देखा है
इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं

गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है
ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं

सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें
गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं

सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे
हम ने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं

मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम
यूँ तो तुम ने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं

दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिन का पेशा
हम ने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं

इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ
तू ने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं

दर्द उठा कर भी सालिम हैं देख करन
हम ने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं

— KARAN

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