अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं
बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं
तुम ने इन आँखों का पानी देखा है
इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं
गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है
ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं
सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें
गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं
सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे
हम ने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं
मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम
यूँ तो तुम ने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं
दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिन का पेशा
हम ने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं
इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ
तू ने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं
दर्द उठा कर भी सालिम हैं देख करन
हम ने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं















