KARAN
KARAN
Ghazal

टूटने की ज़द में, 'रिश्ता चल रहा है

आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है

रात भर आँसू, नहीं थमते हमारे
चल रहा है ख़ैर! जैसा चल रहा है

इश्क़, पहले था कभी, नामे-ख़ुदा पर
अब दिखावा है, दिखावा चल रहा है

हिर्स, मक्कारी, फ़रेब और नफ़रतों का
जिस तरफ़ देखो, तमाशा चल रहा है

थक चुका, पर मंज़िलों के ज़ौक़ में ही
ये मुसाफ़िर, आबला-पा चल रहा है

रात लहरा कर चली है, 'दश्त में अब
ख़्वाब, आँखों में, 'सुहाना चल रहा है

इश्क़ की शतरंज का है, वो 'पियादा
चाल सीधी, हो के टेढ़ा चल रहा है

सोचता हूँ, मैं भी उस के साथ हो लूँ
क़ैस सहरा में, अकेला चल रहा है

ऐ 'ख़ुदा! दुनिया तेरी, कितनी हसीं थी
देख अब दुनिया में, क्या क्या चल रहा है

हैं मुनाफ़े में, 'सियासत की दुकानें
झूठ के दम पर, ये धन्धा चल रहा है

ख़ाक हैं, सच्ची वफ़ा वाले जहाँ में
बस अदाकारों का, सिक्का चल रहा है

पूछते हो क्या, हमारा हाल दिलबर
इश्क़ में जैसा है, अच्छा चल रहा है

ख़ूब मुश्किल है, यूँ चलना रस्सियों पर
बाज़ी-गर तेरा, 'भरोसा चल रहा है

उस ने ही तौफ़ीक़ दी, तो मुतहर्रिक हैं
वो चलाता है, खिलौना चल रहा है

ऐ करन! अब ऐसे, दुनिया चल रही है
अंधे के पीछे जूँ, अंधा चल रहा है

— KARAN

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