KARAN
KARAN
Ghazal

सूरज ग़ुरूब हो गया अख़्तर निकालिए

इस तीरगी का ज़ेहन से अब डर निकालिए

अच्छे बने रहे तो निगल जाएगा जहाँ
ये गुल-फ़िशानी छोड़िए पत्थर निकालिए

इस राएगानी से तो कोई काम लीजिए
बहर-ए-फ़ुग़ाँ की तह से भी गौहर निकालिए

नुस्ख़ा कोई निजात-ए-मुहब्बत का ढूँढिये
जादू कोई या टोना या मंतर निकालिए

तन्हा उदास रूह असीर-ए-अज़ाब है
इस को बदन की क़ैदस बाहर निकालिए

असरार मेरी ज़ात के खुल ही गए तो फिर
अब ऐब इन
में ढूँढ़ के दिन-भर निकालिए

खो ही न जाए अब कहीं गर्द-ओ-ग़ुबार में
दश्त-ए-जुनूँ की ख़ाक से शाइ'र निकालिए

नाकाम इश्क़ में हैं तो कुछ काम कीजिए
रूमाल को झटक के कबूतर निकालिए

अब आख़िरी पड़ाव है मेरी भी प्यास का
फिर क्या ग़रज़ जो बा'द में सागर निकालिए

जाए नज़र जहाँ भी करन इश्क़-इश्क़ हो
ऐसा भी आख़िरश कोई मंज़र निकालिए

— KARAN

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