KARAN
KARAN
Ghazal

इश्क़ से थीं जो भी उम्मीदें, वो सारी बाँधकर

फेंक आया हूँ कुएँ में, आज रस्सी बाँधकर

हसरतें दिल की उसी छज्जे पे टाँग आया हूँ मैं
माँ रखा करती थी, जिस छज्जे से रोटी बाँधकर

ज़िन्दगी जीने की ख़ातिर चल रहे हैं, इन दिनों
रस्सियों पर, लोग सब आँखों पे पट्टी बाँधकर

बद-हवा सेी पर मेरी, दरिया बड़ा हैरान था
आ गया इस पार मैं, उस पार कश्ती बाँधकर

रब्ते-बाहम का निकालूँ फिर कोई मैं रास्ता
फिर कबूतर भेज दूँ, पैरों में चिट्ठी बाँधकर

ढूँढ़ने निकला था जब मैं घर से, ख़ुशियों का सुराग़
ताक़ पर रखदी थी मैं ने, तब उदासी बाँधकर

ख़ामुशी से मैं चला आया था, उस के शहर से
देखती वो रह गई थी, टकटकी-सी बाँधकर

चंद अफ़साने वफ़ा के, और कुछ टूटे-से ख़्वाब
रास्ते में रख गया कोई शराबी, बाँधकर

तोड़ कर पिंजरा, करन, उड़ना बहुत आसान था
पर मुझे रखती है, उस की 'ख़ुश-क़लामी बाँधकर

— KARAN

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