KARAN
KARAN
Ghazal

अपने पैरों में, 'मुहब्बत का 'असर बाँध के हम

घर से निकलेंगे, 'सर-ए-शाम 'कमर बाँध के हम

कितनी ही सख़्तियाँ, 'पेश आएँ मगर आएँगे
आप की सम्त अब 'एहराम-ए-सफ़र बाँध के हम

जिस की नज़रों के, 'मुक़ल्लिद' रहे हैं हम बरसों
छोड़ आए उसी 'साहिर की, 'नज़र बाँध' के हम

हम ने 'वीरान जो देखीं, तो तेरी आँखों में
आ गए, कितने हसीं 'ख़्वाब-नगर' बाँध के हम

गर कहीं आप को मिल जाएँ, ख़बर कर देना
जाने रख आए भला ख़ुद को किधर बाँध के हम

ख़ैर ''उम्मीद-ए-मुहब्बत" थी, मगर लौट आए
आप के 'शहर से दामन में, 'शरर बाँध के हम

छोड़ कर 'आलम-ए-फ़ानी तो है जाना 'बर-हक़
साथ ले जाएँगे सब 'ऐबो-हुनर बाँध के हम

हाए! कटती ही नहीं, ''हिज्र की तन्हा रातें
वस्ल की 'काश कि ला पाते, ''सहर बाँध के हम

डूब जाने से तो बेहतर था, सफ़ीना-ए-दिल
साथ ले आएँ किनारे पे, 'भँवर बाँध के हम

तीरगी हम को करन, भाने लगी है यकसर
चल! छुपा देते हैं, ये 'शम्सो-क़मर' बाँध के हम

— KARAN

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